• TRAVELLER PACHU SHETTY

रुख़सत गांव से शहर का ..... (PART 01)

Updated: Aug 23, 2020

"ठोकर खा कर गिरना फिर खुद को खुद ही संभालना फिर दोबारा से चलना यही संघर्ष है यही जीवन का सत्य है।" (संग्रह -गुगल )


मंगलुर-पुणे-मंगलुर :

प्रसाद विजय शेट्टी,मंगलुर के छोटा सा गांव नेल्लिकारु (कर्णाटक) में रहनेवाला। 1992 से लेकर 2001 तक की पूरी ज़िंदगी पुणे के नजदीक एक छोटा सा गांव नसरापुर में बिताया। अब आप सोचोगे की मंगलुर का लड़का पुणे में कर क्या रहा हे, दरसल में शेट्टी खानदान से हु हमारा खानदानी काम होता हे HOTEL BUSSINES ,तो मेरे पापा होटल चलाते थे नसरापुर में , हम सब मतलब पूरी फॅमिली साथ में थे (अम्मा, पापा,मै और बहन )। मैंने अपनी पढ़ाई भी नसरापुर की मराठी मिडियम में कर रखी है लेकिन सिर्फ चौथी तक पढ़ पाया कारण 2001 में मेरे पापा गुजर गए,उनको TUBERCULOSIS (TB) की बीमारी थी। उनका TREATMENT मंगलुर में ही चलता था,तो हर महीने TABLETS लेने उनको आना पड़ता था,सब ठीक ही चल रहा था अचानक एक बार गांव गए पापा वापिस पुणे ही नहीं आये पता चला की वो अपने गाँव में घर पे है और तबियत बहुत बिगड़ गयी थी, चल तक नहीं रहे थे। ये बात पता चलते ही हम सब गांव के लिए निकल पड़े ,कभी सोचा नहीं था की इतने साल गुजारे हमने नसरापुर में वो दिन हमारा नसरापुर में आखरी दिन था। जब मैंने नसरापुर छोड़ तब मै चौथी में और बहन तीसरी पढ़ रहा थी।


जोर का झटका :

मै ,अम्मा और बहन हम गांव पहुँच गए, हालत बहोत बिगड़ गए थे। पापा की तबियत हद्द से ज्यादा बिगड़ गयी थी। मै और मेरी बहन हम इतने छोटे थे की उस वक्त जो परिस्थिति चल रही थी उसका उतना ज्ञान नहीं था हमें ,हम बस छोटे थे तो छोटे बच्चों की तरह बर्ताव करते थे ,मिट्टी में खलेना ,खेतों में खेलना यही सब चलता था हर दिन। ऐसे ही 2 -3 हफ्ते निकल गए एक दिन जब हम खेत में खेल रहे थे अचानक हमें घर पे बुलाया। घर के अंदर जाते ही सब लोग शांत हैं ,मुझे यह हो क्या रहा है समज नहीं आया आज भी उस वक्त को जब महसूस करता हु तो बहुत डर लगता है। मेरे पापा की आखरी सांसे चल रही थी ,बस वही आधे घंटे का समय था मेरे पापा चल बसे। मेरी जिंगदी का सबसे बड़ा जोर का झटका है ये जो मेरे से मेरे पापा को दूर कर दिया। मेरे पापा के गुजरने के बाद अम्मा ने सोचा की अब हम पुणे नहीं जायेंगे अब यही गांव में रहेंगे।

Late. VIJAY SHETTY (MY DAD)

मरते मरते बच गया :

अब दिक्कत हमें बहुत हो गयी एक दो साल तक,क्यों की मै और मेरी बहन का तो अभी भी बहुत FUTURE बाकी है। सबसे ज्यादा हमारी हालत ख़राब हुयी पढ़ाई में , हमने तो पहले पढ़ाई की थी पुणे में मराठी मीडियम में और हमें यहाँ गांव में पढ़ाई करनी थी कन्नड़ मीडियम ,अरे बाप रे आज भी ये बात सोचता तो पता नहीं बहुत हसी आती है। तब मुझे सिर्फ 3 भाषा आती थी हिंदी ,मराठी और तुलु (तुलु भाषा कर्णाटक के दो DISTRICT में बोली जाती है ) सबसे मजेदार कहानी ये है की जब हमने पुणे छोड़ा था तब मे चौथी में था अगर देखा जाये मुझे मेरे गांव में या तो चौथी में डालना चाहिए या पांचवी में ,लेकिन गांव के टीचर्स मुझे कन्नड़ कुछ भी नहीं आती बोल के पहली में डालना चाहते थे लेकिन मैंने साफ साफ मना कर दिया अम्मा को की अगर पहली में मुझे डालना चाहते है तो में कभी ज़िन्दगी में पढ़ाई ही नहीं करूँगा ऐसे ही घर पर रहूँगा बोल के। फिर मेरे पढ़ाई के बारे में टीचर्स ने DICISSION लिया की पांचवी एडमिशन देने का वादा किया। बस इस SITUATION जब भी याद करता हु तो बस ऐसा लगता की "साला,मरते मरते बच गया नहीं तो पांचवी में पढ़नेवाला मै पहली से पढ़ाई शुरू कर देता। लेकिन कोई नहीं नसीब ने सब बदल दिया। पांचवी से पढाई तो चालु कर दिया लेकिन मुश्किलें बहुत बढ़ रही थी। मुझे तो कन्नड़ का अ आ ई.. तक नहीं आती थी। सब कुछ पहले से सीखना था वो तो मेरा नसीब अच्छा था की एक मुसलमान लड़का मुझे कन्नड़ को हिंदी से Transalate करके देता था। मतलब पांचवी में तो मेरी पूरी ज़िन्दगी कन्नड़ सिखने में निकल गयी , लेकिन आखिर में कन्नड़ सिख लिया लेकिन मराठी मेरे साथ कोई बोलनेवाला नहीं था तो मराठी पूरी तरीके से भूल गया।

. GOVERNMENT SCHOOL NELLIKAR


GOVERNMENT HIGH SCHOOL NELLIKAR



गांव में अपना घर :

पापा के गुजरने के एक साल तक हम नानी के घर रहते थे रेंजाला नाम के एक गांव में। फिर अम्मा ने अलग से रहने का सोच लिया इसलिए नानी के घर से थोड़ी ही दुरी में जगह लेकर एक छोटा सा घर बांधके वह रहने लगे वही से स्कूल तक़रीबन 3km दूर था हर रोज़ चलके जाते थे और वापिस चलके आते थे। बचपन में मुझे ऐसा लगता था की दूसरी घर की क्या जरुरत थी ,लेकिन आज हम बड़े हो गए तब जाके पता चला की अम्मा ने घर क्यों अलग से बांधा। पापा के गुजरने के बाद कमानेवाला अम्मा के अलावा कोई था ही नहीं और रिश्तेदारों से मदत की उम्मीद करना भी पाप है। तो अम्मा ने बीड़ी का काम चालू किया , हमारे यहाँ ज़्यादातर औरतें बीड़ी का काम ही करते हैं ,उसमे थोड़ा पैसे जमा करके अम्मा ने नानी के घर के थोड़े ही दूर में ज्योतिनगर नाम का एक छोटा गांव है वहाँ 2 कमरे का छोटा घर बांध लिया ,जब तक हमारा अपना खुद का घर सही तरीके से बना नहीं था तो वही ऊपर एक घर के बगल में ही थोड़ी जगह थी तो हमने उसमे मिटटी की दिवार चढ़ाकर एक साल तक रहने घर बना लिया था । फिर हमारा अपना घर पूरा हो गया। उस घर का नाम मैंने "श्री शबरी"रख दिया था। सिर्फ घर बनाया था कोई बिजली की व्यवस्था नहीं थी क्यों की जो अम्मा के पास पैसों से तो जितना रहने लायक चाहिए उतना तो हो गया अब आगे का धीरे धीरे होता रहेगा । जब मेरी दसवीं की बड़ी परीक्षा चल रही थी तब मेरे चाचा ने घर में बिजली की व्यवस्था करके दिया , तब तक हमारा घर और पढ़ाई दीप के दिया से ही चलता था।

"SHREE SHABARI" MY SWEET HOME IN NELLIKAR, MANGLORE,KARNATAKA


घर के लिए अम्मा ने जगह भी बहुत अच्छी ढुंढी थी। मतलब प्रकृति के बीचो बीच बहुत कम घर थे नजदीक में और घर के पीछे पुरा जंगल बहुत ही सही जगह थी। जगह भी इतनी शांतता से भरी ही की पढ़ाई करने के लिए एकदम सही जगह थी। घर के पीछे ही एक रोड था हम अगर चलते चलते पढाई करते तब चलने के साथ साथ पढ़ाई भी होती थी।और मै भी ऐसे ही पढ़ाई करता था। बहुत ही सुकून की ज़िन्दगी थी हमारी।


ज़िन्दगी का पहला सपना :

अब कन्नड़ भी अच्छे से आने लगा था तो कोई दिक्कत नहीं हो रहा था पढ़ाई में,स्कूल में भी पढ़ाई में आगे था ऊपर से Sports में भी आगे था। सबसे पसंदीदा खेल था मेरा kho-kho ,इसमें तो मैंने अपना पूरी ज़िन्दगी दे दिया ऐसा लग रहा था, अब Highschool में आने के बाद कुछ स्पोर्ट्स में कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी आ गयी। खो-खो, रनिंग, हाई जम्प इसके अलावा भी बहुत सारे खेल में आगे था। ऐसा नहीं की खेल में आगे था मतलब पढ़ाई तरफ भी ज्यादा ध्यान देता था। इसके अलावा में "स्काउट एंड गाइड्स"में भी भाग लिया था वैसे बताना चाहूंगा "स्काउट्स एंड गाइड्स" में मेरा हाई स्कूल ख़तम होते वक़्त "राज्यपुरस्कार" पूरा हुवा था। इस पढ़ाई और खेल कूद के बीच में एक और टैलेंट मुझे था और वो था DRAWING. मेरी Drawing काफी अच्छी थी। खेल के अलावा Drawing में मैंने बहुत सारे Prize जीते है। जब में 8th था तब पहली बार ANIMATION के बारे में पता चला , मुझे एनीमेशन का नशा कैसे चढ़ा ये भी एक अजीब सी कहानी है ,मुझे पहले से ही मोठे किताब पढना मतलब बहुत गुस्सा आने का , दिवाली का वक्त था, मेरे घर के बाजु के घर पे एक दिवाली की Magzin देखा मैंने उनसे कहा की ये मै पढ़के देता हु। उसमे बहुत कुछ पढ़ लिया उसमे दो पन्ने ऐसे थे जिसमे Animation के बारे में लिखा था उसमे एक दो तस्वीर ऐसी थी की कुछ लोग lightboard के ऊपर drawing कर रहे थे ,अब मैंने सोचा हमें तो वैसे भी Drawing आती है क्या पढ़ना इसे बोल के दो पन्नों को पढ़ा ही नहीं। लेकिन किताब लौटाने से पहले ऐसा लग रहा था की यार सब पढ़ लिया दो पन्नों को क्यों नहीं पढ़ा ये सोच के वो दोनों पन्ने मैंने पढ़ लिया। मेरी ज़िन्दगी के पन्ने पलट दिए वो दो पन्नों ने,मतलब इतने गजब की बात थी उस पन्नो में मैंने तो सोच भी लिया की चाहे कुछ भी हो जाये मै तो अपनी तरक्की ANIMATION में ही करूँगा। तब से मतलब आठवीं से लेकर एनीमेशन का कोर्स करने तक जब भी Newspaper एनीमेशन के बारे में जब भी कुछ Artical आता तो पहले उसे संभालके रखता था और आज भी वो सारे चीज़ें घर पे अलमारी के अंदर याद की निशानी के नाम पे है। कोई यकीन भी नहीं करेगा की मैंने Animation सिखने के चक्कर में दसवीं की पढ़ाई पूरी करके सीधे बारवीं में admission लिया ,ग्यारवीं पढ़ी ही नहीं। गांव के नजदीक बजागोली में "Jnana bharati tutorial collage" में बारवीं पूरा किया।अब मै पूरी तरह से तैयार था ANIMATION कोर्स करने के लिए। उस वक्त बंगलोरे के "एरीना एनीमेशन इंस्टिट्यूट" के बारे में ज्यादा artical आता था।

अम्मा को मै Animation सीखना पसंद नहीं था,उसके लिए कारण भी था ,अम्मा को पता था की ये सीखने के लिए बहुत पैसे की जरुरत थी ,बहुत मतलब लाखों के आसपास , क्यों की अभी तक मैंने जितने भी पढ़ाई की थी उसमे अम्मा के पैसों के साथ मेरा भी थोड़ा पैसा था। में स्कूल के टाइम छुट्टियों के वक्त मेरे घर के बाजु में मेरा दोस्त जावेद था वो पेंटिंग का काम करता था उसके साथ में घर के दिवार पेंटिंग करने के काम पे जाता था। उस वक्त मुझे Rs. 90 /- रुपये मिलते थे एक दिन का काम करने का। फिर भी मैंने सोचा था कुछ लोन करके एडमिशन ले लूंगा,और ज़िन्दगी में पहली बार मै अकेले बेंगलूर के इंस्टिट्यूट में पुछताछ करने के लिए गांव से बस पकड़ लिया ,बेंगलूर में मेरे लिए सब नया ही था। मुझे वह का कुछ पता नहीं था। फिर भी पता नहीं ऐसा कॉन्फिडेंस कहाँ से आता है मुझे। कैसे भी करके बेंगलूर के जयनगर में एरीना एनीमेशन इंस्टिट्यूट को ढूँढा और जाके बात किया वह से सब डाक्यूमेंट्स लेके आया में गांव में लोन का इंतज़ाम कर रहा था। लेकिन नसीब इतना ख़राब की बेंगलूर जाने से पहले बैंक में जिस मैनेजर से बात किया था लोन के लिए बेंगलूर जाके आते ही उस मैनेजर की ट्रांसफर हो गया और जो नया मैनेजर आया था वो लोन देने से मना किया सारे डाक्यूमेंट्स देने के बावजूद भी।मुझे उस वक्त मेरे कोर्स के लिए 2.5 लाख की जरुरत थी। कुछ वक्त सोचता रहा क्या करू ,फिर पता चला की कर्कला (मेरे गांव के नजदीक में पड़नेवाली सिटी) में MEGHATECH COMPUTER INSTITUTE में ANIMATION सिखाते है। पता लगते ही में कर्कला गया और पूछताछ किया पता चला की बात सही है तो कम पैसों में सिखने को मिल रहा था और मैंने एडमिशन लिया और मन लगा कर सिख लिया। ANIMATION में जॉब लेने के लिए ANIMATION DEMOREEL बनानी होती है उसके लिए कंप्यूटर/लैपटॉप जरुरी है मेरे पास ये दोनों भी नहीं था। तो गांव में एक लड़के के पास दिन के 200 भाड़ा देकर मैंने 2 हफ़्तों के लिए लिया और अपना DEMOREEL बनाता रहा,मुझे पता है दिन बहुत कम है फिर भी मैंने हिम्मत नहीं हारी ,अपना काम करता रहा। जबतक मेरा DEMOREEL ख़तम हुवा तब उसी वक्त मेरे छोटे मामा मुंबई से गांव आये थे ,मैंने भी प्लान बनाया की मै मामा के साथ मुंबई जाके वह ANIMATION STUDIO में काम करूँगा ,लेकिन मै जो सोचे वो अगर हो जाये तो मुझ में और भगवान में फ़र्क़ ही कहा रहा। जो होगा देखा जायेगा और मैं अपने सपनों को लेकर मुंबई निकल पड़ा अपने मामा के साथ।


To Be Continued.......

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